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Sk Sharma

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ये धुएँ का एक घेरा कि मैं जिस में रह रहा हूँ
        
                                                    
                            
मुझे किस क़दर नया है मैं जो दर्द सह रहा हूँ
ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे
तिरा इंतिज़ार था जो मैं उसी जगह रहा हूँ
मैं ठिठक गया था लेकिन तिरे साथ साथ था मैं
तू अगर नदी हुई तो मैं तेरी सतह रहा हूँ
तिरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं
तिरी ज़िंदगी में अक्सर मैं कोई वजह रहा हूँ
कभी दिल में आरज़ू सा कभी मुँह में बद-दुआ' सा
मुझे जिस तरह भी चाहा मैं उसी तरह रहा हूँ
मिरे दिल पे हाथ रक्खो मिरी बेबसी को समझो
मैं इधर से बन रहा हूँ मैं उधर से ढह रहा हूँ
शर्मा ज़ी यहाँ कौन देखता है यहाँ कौन सोचता है
कि ये बात क्या हुई है जो मैं शेर कह रहा हूँ। 
2 वर्ष पहले
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