ये धुएँ का एक घेरा कि मैं जिस में रह रहा हूँ
मुझे किस क़दर नया है मैं जो दर्द सह रहा हूँ
ये ज़मीन तप रही थी ये मकान तप रहे थे
तिरा इंतिज़ार था जो मैं उसी जगह रहा हूँ
मैं ठिठक गया था लेकिन तिरे साथ साथ था मैं
तू अगर नदी हुई तो मैं तेरी सतह रहा हूँ
तिरे सर पे धूप आई तो दरख़्त बन गया मैं
तिरी ज़िंदगी में अक्सर मैं कोई वजह रहा हूँ
कभी दिल में आरज़ू सा कभी मुँह में बद-दुआ' सा
मुझे जिस तरह भी चाहा मैं उसी तरह रहा हूँ
मिरे दिल पे हाथ रक्खो मिरी बेबसी को समझो
मैं इधर से बन रहा हूँ मैं उधर से ढह रहा हूँ
शर्मा ज़ी यहाँ कौन देखता है यहाँ कौन सोचता है
कि ये बात क्या हुई है जो मैं शेर कह रहा हूँ।
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