सोचता हूँ कि तेरे यकीं को बरकरार रखूँ
मैं हर कनीज़ से खुद को दरकिनार रखूँ
इससे पहले कि शम्मा जल उठे परवाना आ ठहरा
उसे जलने दूं के शम्मा को देकर हवा परे रखूँ
गुरूर हैं सितारों को कि उनके बीच चाँद रोशन हैं
ग़र हो इज़ाज़त तो उनके सामने तेरी तस्वीर रखूँ
ये इल्तिजा है बारीशों की के तु टहलने ना निकला करे
मगर आस्मां रो पड़े जो मैं तुझको कैद ए कफ़स में रखूँ
उसे देखना भी मेरी इबादत का एक हिस्सा है इस्लाम
इससे पहले कि ख्याल में वो आये खुद को करके बावजू रखूँ
एम. इस्लाम चौधरी
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दरकिनार = दूर
क़ैद ए कफ़स = पिंजरे में बंद
कनीज़ = लड़की लौंडी दासी
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