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उगे उम्मीद की तरह

Siddharth Pandey

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            उगे उम्मीद की तरह... टूटन से ढलने लगे l
        
                                                    
                            
लोग ठिठक के ठहर क्या गए घर चलने लगे ll

हाथ - पाँव रहित देह में... न जाने क्या कमाल हुआ,
घर गुलजार हुए ठिकाने बदलने लगे l

नींव से बैर रहा ज़माने को एक अरसे से,
इत्तेफाकन घर.... अब घर से सम्भलने लगेl

दहलीज पर सबके खड़ा है एक अनजान शख्स,
जान- पहचान में लोग अपनों से जलने लगेl

दुनियां ने दिखलाई है करामातें सबकी,
अच्छा हुआ हम खुद को अच्छे लगने लगे l

स्वारथ का सौदा अकारथ हुआ मुक़्क़मल यारों,
खुद को खरीद - बेच के खुद को ठगने लगे l

सोच में रूहानी सच कुछ उतरा ऐसे,
आँखें नींद से बंद हुईं और खयालात जगने लगे l
-सिद्धार्थ गोरखपुरी
एक वर्ष पहले
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