आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

उगे उम्मीद की तरह

                
                                                         
                            उगे उम्मीद की तरह... टूटन से ढलने लगे l
                                                                 
                            
लोग ठिठक के ठहर क्या गए घर चलने लगे ll

हाथ - पाँव रहित देह में... न जाने क्या कमाल हुआ,
घर गुलजार हुए ठिकाने बदलने लगे l

नींव से बैर रहा ज़माने को एक अरसे से,
इत्तेफाकन घर.... अब घर से सम्भलने लगेl

दहलीज पर सबके खड़ा है एक अनजान शख्स,
जान- पहचान में लोग अपनों से जलने लगेl

दुनियां ने दिखलाई है करामातें सबकी,
अच्छा हुआ हम खुद को अच्छे लगने लगे l

स्वारथ का सौदा अकारथ हुआ मुक़्क़मल यारों,
खुद को खरीद - बेच के खुद को ठगने लगे l

सोच में रूहानी सच कुछ उतरा ऐसे,
आँखें नींद से बंद हुईं और खयालात जगने लगे l
-सिद्धार्थ गोरखपुरी
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर