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हुस्न ए सादगी

shubham yadav

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            तुम्हे मालूम है
        
                                                    
                            
वो ख़ूबसूरती से भी ज़्यादा खूबसूरत है
किसी अधूरे पत्थर से तराशी गयी
पूरी सी मूरत है
तुम्हे मालूम है
उसकी ज़ुल्फ़े घटाओ से भी ज़्यादा घनी है
वो झूठ बोलती है इतराकर
कि वो मेरी तुम्हारी तरह
मिटटी से बनी है
तुम्हे मालूम है
उसकी निगाहें खंजर से भी ज़्यादा तीखी है
मैं ये बोलू या वो
सारी मिसाले उसके आगे फीकी है।

-हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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