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पेड से संवाद

Shri Krishna

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            हमें पता है
        
                                                    
                            
बढ़ते तापमान का राज
इसे सब जानते हैं
पर तुझे काटते हैं
अपनी जरूरत के लिए
इनकी जरूरतें
कुछ खास है
शायद तुझसे ज्यादा।

लोग शायद भूल जाते हैं
कि उनकी सांसें
किनकी सांसो पर टिकीं हैं
जो बदल देते हैं
जहर को अमृत में
जिस जहर को
फैला रहीं हैं
हमारी शौक।

जो ये मोहब्बत है
तुम्हारे होने से है
तुम्हारे खिलने से
आता है बसंत
फिर निकलती है
प्रेम की धारा
तुम्हारे बदलने से
बदल जातीं हैं
अभिलाषाएं
और बदल जाता है
शरीर का रंग।

तुम्हारी चाह है मुझे
नहीं होने दूंगा जुल्म
जो हो रहा तुम्हारे साथ
मैं अकेला नहीं
साथ में और हैं लोग
पर वो लोग ज्यादा हैं
जो कर रहे हैं
तुम्हारी हत्या
और अपने ही भविष्य को
बर्बाद।    


हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले
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