हमराह सब है दिल से कोई साथ नही है ।
अब प्यार की ओ पहली सी बरसात नही है ।।
अब खेलते है खून से सब लोग होलियां ।
ये कैसा दौर आया मुसावात नही है ।।
छायीं है हर इक सम्त अदावत की घटायें ।
उफ़ चैन में कोई भी दिन - रात नही है ।।
ये किसने लगा दी है नज़र घर को हमारे ।
परिवार तो है एक मग़र साथ नही है ।।
दुनिया से मेरी उठ गयी है आज शराफ़त ।
अब खुशियों भरी कोई सौग़ात नही है ।।
~ युवा कवि
शिवसागर यादव
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