विज्ञापन

ढलान पे रखा है पत्थर

Shivcharan Dass

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ढलान पे रखा है पत्थर और कहाँ जायेगा
        
                                                    
                            
जरा सी ठेस पर नीचे ही लुढ़क जायेगा

लड़खड़ाते ही मुझे संभाल लेता है यूँ कौन
कोई पुरानी प्रीत का धागा निकल आएगा

लब तो खामोश हैं निगाहें बोलती हैं खूब
उलझे हुए मसले का जवाब मिल जायेगा

बड़ा मुलायम हाथ ओ रेशमी नाजुक बदन
गुदगुदाते ही ये बच्चा फूल सा खिल जायेगा

इश्क में हमको हमेशा अश्क़ ही नसीब हुए
हश्र बाकी दिल भी हाथ से निकल जायेगा

हमें तो कोई अच्छा लगता है और कोई बुरा
दास हमारे चश्मे से यूं धुंधला नजर आएगा.
एक घंटा पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Chandra prakash

28 कविताएं

View Profile