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ढलान पे रखा है पत्थर

                
                                                         
                            ढलान पे रखा है पत्थर और कहाँ जायेगा
                                                                 
                            
जरा सी ठेस पर नीचे ही लुढ़क जायेगा

लड़खड़ाते ही मुझे संभाल लेता है यूँ कौन
कोई पुरानी प्रीत का धागा निकल आएगा

लब तो खामोश हैं निगाहें बोलती हैं खूब
उलझे हुए मसले का जवाब मिल जायेगा

बड़ा मुलायम हाथ ओ रेशमी नाजुक बदन
गुदगुदाते ही ये बच्चा फूल सा खिल जायेगा

इश्क में हमको हमेशा अश्क़ ही नसीब हुए
हश्र बाकी दिल भी हाथ से निकल जायेगा

हमें तो कोई अच्छा लगता है और कोई बुरा
दास हमारे चश्मे से यूं धुंधला नजर आएगा.
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53 मिनट पहले

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