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दुःख का अहसास

Shivani Lohare

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ढलता हुआ ये दिन
        
                                                    
                            
जैसे थके, भारी होते पाव
छूटता अब एक और हाथ
जैसे उदास कर देती ये शाम
सिर पर बढ़ता ये बोझ
जैसे पुकारने को कोई नहीं पास
गहरी काली हो रात
जैसे सुबह की नही कोई आश।
एक घंटा पहले
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विजय कुमार

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