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वो काफ़ी "सरल" रही है

Shivam Shukla

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            इक ख़ामोशी मुझमें कब से खल रही है
        
                                                    
                            
देखो मेरे कमरे में भी तनहाई पल रही है
यकीनन उस पार भी बेचैनियां बढ़ी होंगी
तभी तो राहे दिल की हसरत मचल रही है
ऐ-जिन्दगी तू ज़रा आकर इससे सबक ले
कहानी की तरह ख़ुद में मुसलसल रही है
ये इल्तिजा है कभी साड़ी में नज़र आओ
जिसकी तुरपायी बनारस में चल रही है
उसने कहा था"सिर्फ़ एक लट निकाल लेंगे"
तब से गालों पे इक लट की उलझन रही हैं
अपने लबों से मेरे गीतों को उन्माद देकर
वो हँसती आँखों में कितनी सजल रही है
उसकी जिंदगी,जद्दोजहद सब किनारे रखो
वैसे अपने नाम से वो काफी "सरल" रही हैं

-शिवम शुक्ला
पता-प्रयागराज

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5 वर्ष पहले
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