हे माधव! छीन ले कलम मेरे हाथों से
कहीं शब्दों का क़त्ल हो न जाए।
अरे कलवे बदरा कहीं दूर जा के रो।
आंसुओं से तेरे, कैदे बीनणी बह न जाए।।