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स्वतंत्रता की अमर कथा : वीर-रस प्रधान राष्ट्र-गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            रक्तिम भोर ने खोल दिए, स्वर्णिम नभ के द्वार,
        
                                                    
                            
रक्त-बूँद से माटी ने, लिख दी जयगाथा अपार।

रणभेरी-सी गूँजी धरती, काँपा तम का जाल,
वीर-रुधिर से लाल हुआ, भारत-भू का भाल।

झाँसी में विद्युत-सी कौंधी, खड्ग बनी हुंकार,
मंगल-स्वर ने फाड़ दिया, पराधीनता का अंधकार।

फाँसी के फंदों पर हँसकर, झूले भारत-लाल,
मृत्यु-कपाट पर दीप जले, अमर हुआ बलिदान।

गंगा ने धोए रक्तिम पग, हिमगिरि बना प्रमाण,
कण-कण ने जय-नाद सुनाया, धन्य हुआ हिंदुस्तान।

चरखे की मंद्रिम धुन में, जागा क्रांति-स्वर,
सत्याग्रह की शांत मशाल ने, हर लिया तम का डर।

अहिंसा की अजेय शक्ति ने, लौह-कपाट गलाए,
जन-मन के जागे ज्वारों ने, दास्य-बंध खुलाए।

तिरंगा जब नभ में लहराया, झूम उठा संसार,
भारत-माता के मस्तक पर, दमका विजय-शृंगार।

यह केवल इतिहास नहीं है, यह जीवित संस्कार,
हर पीढ़ी के प्राणों में हो, स्वाधीनता का प्यार।

गंगा-हिमगिरि जब तक जग में, गूँजें जय-जयकार,
तब तक भारत-भाल सँवारे, तिरंगा बारंबार।
-सनातन मुकुंद
2 घंटे पहले
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