श्वासों का गणित जाने कौन,
किसमें कितने प्राण?
एक श्वास में भोर समाई,
दूजी में अवसान॥
आना-जाना बाँसुरी-सा,
नभ में कोई राग,
अंतर-वीणा झंकृत होती,
मिटता मन का दाग॥
पूरक में सूरज उगता,
रेचक ढलती रात,
कुंभक के मौन क्षणों में,
खुलती अंतर-बात॥
नाड़ी-नाड़ी दीप जलें जब,
झिलमिल हो आकाश,
सूक्ष्म पवन के पंख लगाकर,
उड़ता अंतर्विलास॥
श्वास नहीं केवल वायु,
यह जीवन का मंत्र,
बूँद-बूँद में सागर सोया,
देह बनी यंत्र॥
जितनी भीतर शांति उतरे,
उतना निर्मल नाद,
मौन-महल के द्वार खुलें तो,
मिलता निज संवाद॥
श्वासों की माला जपते-जपते,
टूटे देह-अभिमान,
जिस क्षण श्वास मौन हो जाए,
जागे शाश्वत प्राण॥
आखिर आती किसकी श्वास,
कौन करे निष्क्रमण?
प्राण पूछता मौन अधर से—
“कौन है मेरा स्वामी?”॥
उत्तर बनकर मौन उतरता,
अंतर का आकाश—
“श्वास तुम्हारी नहीं, तुम्हीं हो
श्वासों का प्रकाश।”॥
- सनातन मुकुंद