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शरण : प्रतीकात्मक–रहस्यवादी गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मौन-नभ की वीणा पर किसने, अनहद राग जगाया,
        
                                                    
                            
बूँद बनी जब नाद-तरंग, सागर ने स्वयं बुलाया।

अहं-हिमालय गलता जाए, चेतन-धारा बहती,
शून्य-कुहर में अनाम-ज्योति, मौन-कथा-सी कहती।

श्वास हुई जब मंत्राग्नि, ज्योति हुई अन्तःस्वर,
चरण-कमल में स्व-विलय, अंतर-दीप जगमगाया।

'मैं' का अंतिम नाद थमा तो, खुला स्वयं का द्वार—
शरण वही—जहाँ मौन में, मिल जाए अपना सार।
- सनातन मुकुंद
2 घंटे पहले
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