मौन-नभ की वीणा पर किसने, अनहद राग जगाया,
बूँद बनी जब नाद-तरंग, सागर ने स्वयं बुलाया।
अहं-हिमालय गलता जाए, चेतन-धारा बहती,
शून्य-कुहर में अनाम-ज्योति, मौन-कथा-सी कहती।
श्वास हुई जब मंत्राग्नि, ज्योति हुई अन्तःस्वर,
चरण-कमल में स्व-विलय, अंतर-दीप जगमगाया।
'मैं' का अंतिम नाद थमा तो, खुला स्वयं का द्वार—
शरण वही—जहाँ मौन में, मिल जाए अपना सार।
- सनातन मुकुंद