आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

शरण : प्रतीकात्मक–रहस्यवादी गीतिका

                
                                                         
                            मौन-नभ की वीणा पर किसने, अनहद राग जगाया,
                                                                 
                            
बूँद बनी जब नाद-तरंग, सागर ने स्वयं बुलाया।

अहं-हिमालय गलता जाए, चेतन-धारा बहती,
शून्य-कुहर में अनाम-ज्योति, मौन-कथा-सी कहती।

श्वास हुई जब मंत्राग्नि, ज्योति हुई अन्तःस्वर,
चरण-कमल में स्व-विलय, अंतर-दीप जगमगाया।

'मैं' का अंतिम नाद थमा तो, खुला स्वयं का द्वार—
शरण वही—जहाँ मौन में, मिल जाए अपना सार।
- सनातन मुकुंद
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक घंटा पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर