विज्ञापन

सावन मुस्काए रे : श्रृंगार–प्रकृति कजरी गीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घिर-घिर आए मेघ गगन में,
        
                                                    
                            
सावन मुस्काए रे।
पावस की रिमझिम बूँदों से,
मन-वीणा झंकृत हो जाए रे॥

सावन आया, मनभावन आया,
धरती ने श्रृंगार किया।
हरियाली की मधुर चूनर ने,
जीवन का सत्कार किया॥

कलियाँ हँसकर बोल उठीं,
हरित मधुवन मुस्काया।
नव अंकुर की कोमल हँसी ने,
जीवन में उल्लास जगाया॥

माटी की सौंधी खुशबू में,
बचपन फिर मुस्काया।
नदिया ने कलरव करके,
नव संदेश सुनाया॥

बिजुरी चमकी नभ-आँगन में,
बादल ढोल बजाए रे।
कोयल की मधुर तान संग,
मन सावन हो जाए रे॥

मेघों ने मधुर तान छेड़ी,
प्रकृति ने उपहार दिया।
पावस की हर एक बूँद ने,
धरती को नव प्यार दिया॥

झूले पड़ें कदंब तले,
गीत मल्हार सुनाएँ।
प्रेम-रंग में भीगे मन,
मधुर मिलन को पाएँ॥

पुरवैया मधुर संदेशा,
अंग-अंग सहलाए।
आम्र-विटप की डाली-डाली,
नव हरियाली छाए॥

पपीहा पिया-पिया बोले,
मन में प्यास जगाए।
सावन की मधुर सुरभि से,
जीवन पुलकित हो जाए॥

मोर पंख फैलाए नाचे,
मेघों की झंकार।
वन-उपवन मुस्काते देखो,
सज उठे संसार॥

इंद्रधनुष के सातों रंग,
नभ पर छटा सजाएँ।
स्नेह-सुधा बरसाए सावन,
प्रेम-सुगंध बिखराएँ॥

घिर-घिर आए मेघ गगन में,
सावन मुस्काए रे।
पावस की रिमझिम बूँदों से,
मन-उपवन महकाए रे॥
- सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all