अंतर-दीप समर्पित हो, तम में चिर ज्योति रहे,
श्वास-श्वास अर्पण बनकर, चेतन में चिर शांति रहे।
अहं-हिमालय गलता जाए, प्रेम-सलिल अविराम बहे,
स्वार्थ-शिला जब टूटे भीतर, आत्मतत्त्व निष्काम रहे।
मौन-मंत्र में ढलता मन, ईश्वर में अनुराग रहे,
कर्म-कुसुम अर्पित हों ऐसे, फल-लिप्सा से विराग रहे।
बूँद समर्पित सागर में, अपना अस्तित्व भुलाए,
जो कुछ अपना अर्पित करके, आत्मा अनंत समाए।
- सनातन मुकुंद