घन-डमरू की मौन थाप में, कौन अनहद गाता है,
बूँद-बूँद रुद्रत्व पिघलाकर, अंतर-दीप जलाता है।
जटा-गगन से चेतन-गंगा, मन-कैलास नहाती है,
नीलकंठ की नील शांति में, विष-ज्वाला सो जाती है।
चंद्रकला जब मौन उतारे, शून्य स्वयं मुस्काता है,
तांडव के हर पद में छिपकर, नव-सृजन बीज जगाता है।
सावन बाहर मेघ नहीं है, अंतर का अभिषेक है,
हर बूँद भीतर लिख जाती, ब्रह्म-स्मृति का लेख है।
‘मैं’ की अंतिम गाँठ खुले तो, कौन रहा फिर जानने को?
श्वास-श्वास शिव, नाद-नाद शिव—कौन बचा पहचानने को?
कैलास कहीं बाहर नहीं है, अंतरतम में ज्योति जगी,
बूँद स्वयं जब शून्य हुई तो, शिव में अपनी सत्ता मिली।
- सनातन मुकुंद