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सावन : अंतर का शिवाभिषेक : रहस्यवादी–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            घन-डमरू की मौन थाप में, कौन अनहद गाता है,
        
                                                    
                            
बूँद-बूँद रुद्रत्व पिघलाकर, अंतर-दीप जलाता है।

जटा-गगन से चेतन-गंगा, मन-कैलास नहाती है,
नीलकंठ की नील शांति में, विष-ज्वाला सो जाती है।

चंद्रकला जब मौन उतारे, शून्य स्वयं मुस्काता है,
तांडव के हर पद में छिपकर, नव-सृजन बीज जगाता है।

सावन बाहर मेघ नहीं है, अंतर का अभिषेक है,
हर बूँद भीतर लिख जाती, ब्रह्म-स्मृति का लेख है।

‘मैं’ की अंतिम गाँठ खुले तो, कौन रहा फिर जानने को?
श्वास-श्वास शिव, नाद-नाद शिव—कौन बचा पहचानने को?

कैलास कहीं बाहर नहीं है, अंतरतम में ज्योति जगी,
बूँद स्वयं जब शून्य हुई तो, शिव में अपनी सत्ता मिली।
- सनातन मुकुंद
4 घंटे पहले
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