पितृ-स्मृति के सूक्ष्म तंतु, प्राणों में संचारित हैं,
दृश्य देह के पार अदृश्य, संस्कारों में संचित हैं।
रक्त-धारा में कौन प्रवाहित, किसका चिर-आह्वान है?
श्वासों की निःशब्द वीणा में, किसका गूढ़ विधान है?
जिन चरणों से पावन हुई, कण-कण यह वसुंधरा,
उनके तप की सूक्ष्म आभा से, जीवन में उतरी प्रभा।
तर्पण की जलधारा में भी, केवल जल का दान नहीं,
अंतर में जो ऋण सुप्त पड़ा है, उससे बड़ा विधान नहीं।
पिण्ड नहीं केवल अन्नकण, पितृ-ऋण का बोध बने,
अर्पण में अहं का विसर्जन, आत्मबोध का स्रोत बने।
काल भले ही देह हर ले, चेतन-सूत्र कहाँ टूटे?
नाम मिटे, आकार मिटे, संस्कारों के बीज न छूटे।
पितृपक्ष का कृष्ण-पक्ष ही, अंतर्मन का द्वार बने,
मौन तिमिर के गर्भ से फिर, आत्मप्रकाश साकार बने।
जो मूलों का मान रखे, वह शाखाओं का मर्म जाने,
वंश-वृक्ष की गहन जड़ों में, अपना ही विस्तार माने।
पितृ केवल अतीत नहीं हैं, वर्तमान के स्पंदन हैं,
उनके तप के सूक्ष्म प्रभाव, आज हमारे जीवन हैं।
पितृ-पथ से प्राप्त चेतना, कर्म-पथ में रूप धरे,
स्मृति केवल शेष न रह जाए, जीवन में संस्कार भरे।
पितृ-ज्योति से आलोकित, नव-पीढ़ी के दीप जले,
पूर्वजों से पाया जो अमृत, कर्म-प्रवाह से आगे चले।
ऋण चुकता हो कर्म-ज्योति से, निर्मल हो अभिमान,
पितृ-स्मृति से आत्मबोध तक—यही श्राद्ध का ज्ञान।
- सनातन मुकुंद