व्योम निहार रहा चुपचाप धरा का प्रथम निमंत्रण,
नभ में झरता मौन, रचता मेघों का मधुर समर्पण।
इंद्रधनुष रचता रंगों में अनकहा दिव्य जीवन-राग,
शक्रचाप बन जोड़ रहा है क्षितिजों का दिव्य सुहाग।
पावस ने पल्लव-पल्लव में प्राणों का संगीत जगा,
वर्षा-ऋतु ने कण-कण में नवजीवन का मंत्र जगा।
प्रणय बना जब बूँद, पिघलकर चेतन-अंतर में उतरा,
अनुराग हुआ ब्रह्मस्वर, जग का मौन स्वयं ही निखरा।
- सनातन मुकुंद