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मेघ-प्रणय : गीत

                
                                                         
                            व्योम निहार रहा चुपचाप धरा का प्रथम निमंत्रण,
                                                                 
                            
नभ में झरता मौन, रचता मेघों का मधुर समर्पण।

इंद्रधनुष रचता रंगों में अनकहा दिव्य जीवन-राग,
शक्रचाप बन जोड़ रहा है क्षितिजों का दिव्य सुहाग।

पावस ने पल्लव-पल्लव में प्राणों का संगीत जगा,
वर्षा-ऋतु ने कण-कण में नवजीवन का मंत्र जगा।

प्रणय बना जब बूँद, पिघलकर चेतन-अंतर में उतरा,
अनुराग हुआ ब्रह्मस्वर, जग का मौन स्वयं ही निखरा।
- सनातन मुकुंद
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10 घंटे पहले

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