शंख-हृदय में मौन सिंधु, जाने कौन पुकार रहा,
बूँद-बूँद में सागर सोया, मन फिर भी क्यों हार रहा?
काँटों की सेजों पर सोया, फूल-सुगंध को तरसे मन,
मरु-मरीचिका ओढ़े नयन, खोजें अमृत-नीर-सुमन।
दीपक जलता, धुआँ कहता—लौ में कैसा दाह छिपा,
तम की तह में ज्योति सँभाले, कौन स्वयं से दूर हुआ?
नदिया अपना रूप लुटाकर, सागर में खोती जाती है,
मौन व्यथा जब स्वर पाती है, अनहद वीणा गाती है।
शशि-किरण जब नीर में उतरे, लहरें भेद सुनाती हैं,
तिमिर-गर्भ से फूट किरणें, अंतर-ज्योति जगाती हैं।
मृग-नाभि की गंध न पहचाने, वन-वन व्यर्थ भटकता है,
जिसको बाहर खोज रहा था, वह अंतस में महकता है।
पीर बनी जब मौन साधना, भीतर दीप जलाती है,
अश्रु-बूँद की निर्मल धारा, मन की मैल बहाती है।
‘मैं’ की दीवारें गलती जाएँ, भेद सभी मिट जाएँ,
बूँद स्वयं जब सिंधु में घुले, पीर प्रार्थना बन जाए।
प्रार्थना जब मौन हो जाए, श्वास स्वयं मंत्रित हो,
पीर पिघलकर प्रेम बने तो, चेतन में चिरशांति हो।
-सनातन मुकुंद