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कृष्ण : चेतना, कर्म और करुणा का अनंत विस्तार

श्री सनातन

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                            मुरली से गीता तक,
        
                                                    
                            
प्रेम से प्रज्ञा तक,
कृष्ण! तुम्हीं चेतना,
कृष्ण! तुम्हीं कर्म हो।
करुणा की धार बन,
बहते हो संसार में—
अंतर से अनंत तक,
तुम ही विस्तार॥

यमुना-तट मुरली बजी,
जागा सोया मन।
एक तान में बँध गया,
धरती और गगन॥

माखन-हँसी में माधुर्य,
नयनों में नील गगन।
राधा के निर्मल प्रेम में,
धड़का तुम्हारा मन॥

मुरली से गीता तक,
प्रेम से प्रज्ञा तक,
कृष्ण! तुम्हीं चेतना,
कृष्ण! तुम्हीं कर्म हो॥

रण में जब अर्जुन रुका,
डोला उसका मन।
तब तुमने गीता कह दी—
कर्तव्य ही धर्म॥

फल की आस त्यागकर,
कर्म करो निष्काम।
समता में स्थित रहो—
यही योग का नाम॥

मोह जहाँ भी घेरता,
गीता वहाँ पुकार—
उठ अर्जुन! अपना कर्म कर,
मुझ पर रख विश्वास।

न तुम केवल गोकुल के,
न केवल वृंदावन।
तुममें पूरा विश्व बसा,
तुममें जीव-स्पंदन॥

जहाँ दया की दृष्टि है,
वहीं कृष्ण का वास।
जहाँ परहित कर्म है,
वहीं तुम्हारा प्रकाश॥

ज्ञान बने जब दीप-सा,
प्रेम बने उजियार।
करुणा से पूर्ण हो,
मानव का संसार॥

“मैं” की सीमा टूटे जब,
“सबमें मैं” दिख जाए।
जीव-जगत् के भेद मिटें,
चेतन एक हो जाए॥

अंतर का कुरुक्षेत्र,
रोज खड़ा है सामने।
मोह घने जब घेर ले,
कृष्ण पुकारें मन में॥

इंद्रिय-रथ को साधकर,
विवेक बने सारथी।
कर्म-पथ पर बढ़ता जाए,
चेतन मानव-रथी॥

मुरली अब भी बज रही,
सुन ले अंतर-ध्वनि।
गीता अब भी बोलती—
जागो अपनी चेतना॥

प्रेम तुम्हारा मूल है,
कर्म तुम्हारा सार।
करुणा तुम्हारा रूप है—
कृष्ण! तुम्हीं विस्तार॥

मुरली की मधुर तान से,
गीता के ज्ञान तक,
गोपाल की सरलता से,
योगेश्वर के ध्यान तक।

युग बदले, जग बदले,
अक्षय रहे पुकार—
कृष्ण! चेतना बनो भीतर,
करुणा बहे संसार॥

प्रेम तुम्हारा मूल रहे,
कर्म बने आधार।
चेतना में कृष्ण जगे,
करुणा बने विस्तार॥
- सनातन मुकुंद
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