जीवन-वीणा झंकृत हो, प्रेम-मधुरिम तार,
मरु-मन पर मेघ बरसें, भीगे अंतस-द्वार।
स्नेह-दीप से तम गल जाए, जागे ज्योति अपार,
शिला-हृदय पिघलकर फूटे, करुणा-निर्झर धार।
काँटों में मुस्कान खिले तो, महके जग-व्यवहार,
घावों पर ममता उतरकर, हर ले पीड़ा-भार।
नदी समाई सागर में, खो बैठी आकार,
बूँद मिली जब सिंधु से, मिटा भेद-अहंकार।
‘मैं’ की दीवारें ढह जाएँ, जागे एकाकार,
अंतर-आकाश खुलते ही, मिट जाए अँधियार।
मंदिर, मस्जिद, वेद, प्रार्थना—एक प्रेम-पुकार,
जिस हृदय में प्रेम जगा है, वहीं बसे करतार।
प्रेम बंधन, प्रेम ही मुक्ति, प्रेम अनंत विस्तार,
स्वयं मिटे तो विश्व मिले, प्रेम बने आधार।
श्वास-श्वास में प्रेम बहे तो, जीवन हो साकार,
हृदय जहाँ तक प्रेम धरे, वहीं खिले संसार।
-सनातन मुकुंद