विज्ञापन

इनायत : रहस्यवादी–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सूखे बीज की निद्रा में, कौन सुधा बरसाता है,
        
                                                    
                            
मरु-नयन की प्यास बुझाकर, कौन घटा बन जाता है?

बुझते दीपक की लौ में कौन, प्राण-स्पंदन भरता है,
मौन शंख के अंतर में कौन, अनहद नाद जगाता है?

टूटी वीणा के तारों पर, कौन नया स्वर धरता है,
शून्य हृदय की देहरी पर, कौन स्वयं आकर ठहरता है?

पथराई पलकों के नीचे, कौन प्रभात जगाता है,
राख हुए स्वप्नों में कौन, फिर से फूल खिलाता है?

हिम-सा जड़ अहं पिघलाकर, कौन नदी बनाता है,
बंद दर्पण के धुँधलेपन में, कौन स्वयं को दिखलाता है?

सूनी धरा के अंतर में, कौन हरितिमा लाता है,
पतझर की निस्तब्ध डालों पर, कौन नव-पल्लव लाता है?

बूँद-बूँद की तृष्णा हरकर, कौन सिंधु बुलाता है,
डूब गया जब ‘मैं’ का कण, तब कौन शेष रह जाता है?

मौन हुआ जब प्रश्न हृदय का, उत्तर भीतर गूँजा,
जिसे बिना पुकारे पाया—वही अनकही इनायत है।
-सनातन मुकुंद
4 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Pandit Chandradutt

2967 कविताएं

View Profile

PRAVEEN KUMAR

6 कविताएं

View Profile