हलधर! तेरे हल की रेखा, धरती का श्रृंगार,
माटी के उर में जागे, जीवन का नव-उद्गार।
श्वेत हिमाचल-सा निर्मल, शेष-फणों-सा धीर,
तेरे स्पर्श से धरा सँवरे, मिटे जगत की पीर॥
नील गगन की छाँह में, हल की ध्वनि झंकारे,
सूखे मन के खेतों में, आशा-बीज उबारे।
माटी की मुट्ठी में पलता, अन्नमय संसार,
श्रम की स्वर्णिम रेखा लिखता, हलधर बारंबार॥
हल केवल लौह-फाल नहीं, कर्म-ज्योति की धार,
अंतर-क्षेत्र जोतते ही, मिटे मोह-अंधकार।
काम-क्रोध के कंटक-वन, विवेक-हल से कटें,
सद्भावों के बीज उगें, निर्मल विचार फले॥
हलषष्ठी की पावन बेला, मातृ-आस्था गाए,
अन्न, धरा और संतति का, मंगल दीप जलाए।
हे बलदाऊ! अंतस-धरती, फिर उर्वर कर दो—
हर मन अपनी भूमि जोतकर, स्वयं कृष्णमय हो॥
- सनातन मुकुंद