तम की वीणा पर भोर की, अनहद तान सुनाते हैं,
अश्रु-कणों में चाँद घोलकर, मौन दीप जलाते हैं।
काँटों की निद्रा में चुपके, फूलों के स्वप्न उगाते हैं,
विषधर रातों की देहरी पर, अमृत-पग धर जाते हैं।
अहं-हिमालय गलता जाए, चेतन-गंगा बहती है,
निज से निज का परदा हटे, अंतर-ज्योति कहती है।
श्वासों के अनहद आकाश में, कौन पंख फैलाता है—
जहाँ प्रेम स्वयं सत्य बने, फरिश्ता वहीं मुस्काता है।
- सनातन मुकुंद