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फरिश्ते : आध्यात्मिक गीतिका

                
                                                         
                            तम की वीणा पर भोर की, अनहद तान सुनाते हैं,
                                                                 
                            
अश्रु-कणों में चाँद घोलकर, मौन दीप जलाते हैं।

काँटों की निद्रा में चुपके, फूलों के स्वप्न उगाते हैं,
विषधर रातों की देहरी पर, अमृत-पग धर जाते हैं।

अहं-हिमालय गलता जाए, चेतन-गंगा बहती है,
निज से निज का परदा हटे, अंतर-ज्योति कहती है।

श्वासों के अनहद आकाश में, कौन पंख फैलाता है—
जहाँ प्रेम स्वयं सत्य बने, फरिश्ता वहीं मुस्काता है।
- सनातन मुकुंद
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54 मिनट पहले

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