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भादो से शरद के बाट : लोक-संगीतात्मक सामाजिक गीत

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            भादों घाम पियर-पियराइल, शरद के आहट आइल बा,
        
                                                    
                            
छितराइल बदरा के पीछे, नील गगन मुसकाइल बा।
कास-कुसुम के उज्जर चूनर, चहुँदिस धरती ओढ़ाइल बा,
कनइल-नेनुआ पीयर-पीयर, अँखियन मन हरषाइल बा।

खेत किनारे बजरा झूमे, उरदी दाना भराइल बा,
सनई, पटुआ, सांवा, कोदो, माटी में रस घुलाइल बा।
कोंहड़ा फूल पर भँवरा डोले, मधु पी-पी बउराइल बा,
कुकुहड़ी के लमहर बाल पर, कउवा लोभाइल बा।

धान के हरियर चूनर ओढ़े, खेतवा दूर लहराइल बा,
बरखा रूठल होखे तबहूँ, आस न मन से टराइल बा।
जोतल माटी मह-मह महके, धरती गंध बिखराइल बा,
परती छाती चीर के हल चलल, बीज नया मुसकाइल बा।

झुंड-झुंड चिरई चहकेलीं, भोर नया बतियाइल बा,
गो-धूली के कोमल बेला, पग-पग नेह बरसाइल बा।
गाँव-सिवान के हरियर सपना, आँखिन में बसाइल बा,
माटी के माथे पसीना, जीवन-दीप जराइल बा।

बाकिर धीरे-धीरे देखीं, कइसन रंग बदलाइल बा,
सूखल पोखर, फाटल नदिया, जल के नाम बचाइल बा।
मेघ घिरल आ बरखा नइखे, धरती कंठ सुखाइल बा,
बेर्रा फूल के बाट जोहत, सावन बीत गइल बा।

गइया-बरध खेत से हटके, चरनी में बँधाइल बा,
हल के मूठ पकड़त हाथ अब, काम से कतरा गइल बा।
मेहनत के माथे धूर पड़ल, मुफ्त के मोल बढ़ाइल बा,
अन्न उगावे वाला भूखे, राशन से पेट भराइल बा।

दूध के मटकी सूनी पड़ल, पाउडर घर में आइल बा,
हाट-बजार के चकाचौंध में, गाँव कहीं गुमाइल बा।
माटी से जे नाता टूटल, मन भीतर सूखाइल बा,
घर-आँगन में दीया जलल, भीतर तम छा गइल बा।

दोष पराया माथे धरके, अपना करम भुलाइल बा,
काहे देश पछुआइल बाटे, ई सवाल दबाइल बा।
जाति-धरम के धुआँ उठाके, मन के खेत जराइल बा,
एक-दूसरा के दोष गिनावत, अपना हल टँगाइल बा।

ए माटी के लाल सुनऽ अब, धरती बात बताइल बा,
मेहनत के पसीना पड़ते, सूखल खेत हरियाइल बा।
बरखा खातिर मेघ निहोरे, खेत निहोरे हल के साथ,
भाग भरोसे बैठल मन से, सूखल खेत न सिंचाइल बा।

फेरु भोर के लाल किरणिया, पूरब ओर से आइल बा,
कास फूले, मन फिर जागे, आशा दीप जराइल बा।
माटी, मेहनत, प्रेम बचाईं, गाँव तभी मुसकाइल बा,
आपन करम सँवारब जब-जब, देशो आगे आइल बा।

भादो से शरद के बाट ई, जीवन-पाठ सुनाइल बा,
धरती कहे—“जे बीज बोइबऽ, ओही फल घर आइल बा।”
माटी, पानी, श्रम अउर नेहवा, जीवन-गीत बनाइल बा,
गाँव बची तऽ देश बचेगा, ई संदेश सुनाइल बा।
-सनातन मुकुंद
15 घंटे पहले
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