विज्ञापन

शिष्य निज अंतस में पाए, दिव्य आत्म-उजियार।

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मान-पगड़ी सिर पर बाँधो, लाज सदा रखनी है,
        
                                                    
                            
आँधी आए, धूल उड़ाए, रीढ़ अडिग रखनी है।

धूप जले या राह दहके, चाल न डिगने पाए,
माथे का निर्मल नभ अपना, कोई छीन न पाए।

निज डोर स्वयं ही थामो, निज पंथ स्वयं सँवारो,
मान न माँगो जग के द्वारे, निज गौरव मत हारो।

कंचन-मणि फीके पड़ते, निर्मल मन के आगे,
सत्य-सूर्य के सम्मुख झुकें, मोह-तम सब भागे।

काल करे सहस्र प्रहार, तन-मन चाहे टूटे,
चरित्र-शिला अचल रहे, सत्य कभी न रूठे।

पगड़ी केवल वस्त्र नहीं है, अंतर-ज्योति अपार,
माथे पर जो सत्य विराजे, वही अमर श्रृंगार।

निज सत्य जिसे प्रिय रहता, कौन उसे झुका पाता?
अपनी पगड़ी अपने हाथ—मानव स्वयं बचाता।
-सनातन मुकुंद
एक महीने पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all