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आंदोलन का अपहरण : प्रतीकात्मक छंदमुक्त कविता

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            असहमति
        
                                                    
                            
लोकतंत्र की धड़कन है,

किन्तु
जब उसके स्वर में
संयम की अंतिम प्रतिध्वनि भी डूब जाए,

तब
विचार नहीं,
उन्माद बोलता है।

जहाँ
तर्क के मुख पर
अपशब्दों की कालिख पोत दी जाए,

जहाँ
संवाद का कंठ
कोलाहल की मुट्ठियों में घुट जाए,

जहाँ
पुस्तकों के स्थान पर
पत्थर ही पाठ बन जाएँ,

और
कलम से पहले
लाठियाँ अपना परिचय देने लगें,

वहाँ
परिसर ज्ञान का तीर्थ नहीं,
भय का भूगोल बन जाता है।

छात्र
जब प्रश्नों से नहीं,
प्रहारों से पहचाने जाने लगें,

समझ लेना—
युवा चेतना की देहरी पर
अराजकता ने अपना ध्वज गाड़ दिया है।

क्रांति
चेहरे छिपाकर नहीं आती,

न ही
गालियों और अश्लीलता की दुर्गंध में
परिवर्तन का कोई पुष्प खिलता है।

जिस भीड़ में
अपराध आदर्श का मुखौटा पहन ले,

और
हिंसा अधिकार की भाषा बोलने लगे,

वहाँ
सबसे पहले लोकतंत्र की आत्मा आहत होती है।

याद रखो—

आग
इमारतें जला सकती है,
विचार नहीं।

पत्थर
शीशे तोड़ सकते हैं,
विश्वास नहीं गढ़ सकते।

जो हाथ
संवाद के स्थान पर
विनाश का उत्सव रचते हैं,

वे
इतिहास के पन्नों पर
निर्माण नहीं,
विनाश के हस्ताक्षर छोड़ जाते हैं।

इतिहास
प्रतिरोध का सम्मान करता है,

पर
अराजकता को
कभी वैधता नहीं देता।

क्योंकि
परिवर्तन की सबसे प्रखर मशाल
क्रोध नहीं—

चरित्र है,
संयम है,
विवेक है।
- सनातन मुकुंद
2 घंटे पहले
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