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अनन्त चतुर्दशी : आध्यात्मिक–दार्शनिक गीतिका

श्री सनातन

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            अनन्त-सूत्र में बँधा, यह दृश्य-जगत् संसार है,
        
                                                    
                            
सूक्ष्म तंतु में स्पंदित, चिरचेतन का विस्तार है।

काल-चक्र की नाभि में, घूमे जन्मों का प्रवाह,
क्षण-क्षण गलता देह-पात्र, शेष रहता आत्म-प्रकाश।

चौदह लोकों के पार जो, मौन शून्य में ज्योति है,
वही अनन्त अधिष्ठान, वही चेतन की ज्योति है।

गाँठ कर्म की खोलकर, अर्पित कर दे अहंकार,
सूत्र नहीं केवल कलाई, बाँधता भीतर का विकार।

लहर स्वयं जब सिंधु में, खो दे अपना नाम-रूप,
तब अनन्त में लीन हो, मिटता सीमितता का स्वरूप।

अनन्त-व्रत का सत्य यही—‘मैं’ से ‘तू’ तक हो विस्तार,
बंधन टूटे देह का, आत्मा पाए अनन्त आधार।
- सनातन मुकुंद
5 घंटे पहले
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