जो न समझा चुप को, वो अल्फ़ाज़ क्या समझेगा
जो न समझा दिलों को, वो अन्दाज़ क्या समझेगा
यारो उमड़ता है आँखों में, दर्द ए दिल का समन्दर,
जो न समझा अश्कों को, वो आवाज़ क्या समझेगा
न जाने बेहोशियों में, कर गुज़रते हैं क्या क्या लोग,
जो न समझा अंजाम को, वो आगाज़ क्या समझेगा
आदमी की फ़ितरतों ने, रोक रखे हैं कदम खुद के
जो न समझा परिंदों को, वो परवाज़ क्या समझेगा
कुछ का तो बस काम है, दिल तोड़ना दुखाना "मिश्र",
जो न समझा मर्ज़े दिल को, वो इलाज़ क्या समझेगा
-शांती स्वरूप मिश्र