जब बचपन याद आता है,
तब माँ की प्यारी मुस्कान ज़रूर याद आती है।
माँ, भगवान की बनाई हुई सबसे सुंदर रचना है।
माँ ,वही साथी है,
जिसने हमें अपने हाथों से भोजन कराया,
वह जो खुद रातों को जागकर
हमें लोरी गाकर सुलाया।
हाँ, शिकायतें भी रहती हैं तुमसे माँ,
जब तुम हमें डाँट देती हो,
पर तुम्हारी वही डाँट
आज हमें एक बेहतर इंसान बना गई है।
कितनी अद्भुत हो तुम माँ,
पहले डाँटती हो,
और फिर प्यार से गले लगा लेती हो।
कहाँ से लाती हो तुम अपने भीतर इतनी प्रतिभा माँ?
तुम्हें ये सब किसने सिखाया?
शायद भगवान भी सोचता होगा—
कि मैंने क्या रचना कर दी,
जो अपने बच्चों के लिए लड़ जाती है,
जान दे देती है, पर हारती नहीं।
तुम्हें नमन है माँ ....