शाम हो चुका हूँ मैं पर ढलना अभी बाकी है
लड़खड़ा कर गिर चुका हूँ मैं पर सम्भलना अभी बाकी है
नौकाएं लाख बदल ली मैंने नाखुदा बदलना अभी बाकी है
बेशक छा गई है लालिमा पूर्व में पर सूरज का निकलना अभी बाकी है
खुद को कठोर चाहे मान लूँ टूट कर बिखरना अभी बाकी है
कुछेक खुशियां ही तो मिली है राहों में लाखों गमो से सिहरना अभी बाकी है
अभी तो सिर्फ राह मचली है ,मंजिल का बहकना अभी बाकी है
सिर्फ एक चिंगारी लगी है मुझमे दावानल सा बहकना अभी बाकी है
-इशायु
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