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मुलाक़ातों के सिलसिले

Shailendra Bhatnagar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मुलाक़ातों के सिलसिले फ़साने बन गए,
        
                                                    
                            
रफ़्ता-रफ़्ता  मोहब्बत के तराने बन गए।

राह-ए-शौक़ में ज़रा से बे-ख़बर होते ही,
ज़माने में रुसवाई के नए बहाने बन गए।

बुरा हुआ अंजाम इन्तिहाई मोहब्बत का,
बारगाह-ए-इश्क़ में बादा-ख़ाने  बन गए।

गली-मोहल्लों में  सजने  वाले  जमावड़े,
ना-मुराद इश्क़ के  नए ठिकाने बन गए।

दौर-ए-ख़िजाँ में उजड़े पेड़ों की शाख पे,
बे-घर हुए परिंदों के आशियाने बन गए।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
20 घंटे पहले
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