आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मुलाक़ातों के सिलसिले

                
                                                         
                            मुलाक़ातों के सिलसिले फ़साने बन गए,
                                                                 
                            
रफ़्ता-रफ़्ता  मोहब्बत के तराने बन गए।

राह-ए-शौक़ में ज़रा से बे-ख़बर होते ही,
ज़माने में रुसवाई के नए बहाने बन गए।

बुरा हुआ अंजाम इन्तिहाई मोहब्बत का,
बारगाह-ए-इश्क़ में बादा-ख़ाने  बन गए।

गली-मोहल्लों में  सजने  वाले  जमावड़े,
ना-मुराद इश्क़ के  नए ठिकाने बन गए।

दौर-ए-ख़िजाँ में उजड़े पेड़ों की शाख पे,
बे-घर हुए परिंदों के आशियाने बन गए।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
18 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर