मुलाक़ातों के सिलसिले फ़साने बन गए,
रफ़्ता-रफ़्ता मोहब्बत के तराने बन गए।
राह-ए-शौक़ में ज़रा से बे-ख़बर होते ही,
ज़माने में रुसवाई के नए बहाने बन गए।
बुरा हुआ अंजाम इन्तिहाई मोहब्बत का,
बारगाह-ए-इश्क़ में बादा-ख़ाने बन गए।
गली-मोहल्लों में सजने वाले जमावड़े,
ना-मुराद इश्क़ के नए ठिकाने बन गए।
दौर-ए-ख़िजाँ में उजड़े पेड़ों की शाख पे,
बे-घर हुए परिंदों के आशियाने बन गए।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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