विज्ञापन

गाहे-ब-गाहे  जब  चाँद झाँकता है  दरीचे से, तीरगी उसके  इर्द-गिर्द रक्स किया करती है।

Shailendra Bhatnagar

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ख़यालों की खिड़की तेरी राह तका करती है,
        
                                                    
                            
करवटें  बदलते हुए  मेरी रात कटा करती है।

फ़क़त ख़यालों में तेरी आमद के इंतिज़ार में,
उम्मीद की शम'आ चुप-चाप जला करती है।

मेरे दिल का उजड़ा गुलशन आबाद होने की,
खुली हुई खिड़की  दिन-रात  दुआ करती है।

गाहे-ब-गाहे  जब  चाँद झाँकता है  दरीचे से,
तीरगी उसके  इर्द-गिर्द रक्स किया करती है।

अंगड़ाइयाँ लेने लगते मेरे सोए हुए  जज़्बात,
याद-ए-माज़ी की जब बयार चला करती है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
19 घंटे पहले
विज्ञापन

विशेष

आज के शीर्ष कवि Show all

Dn Chaubey

7573 कविताएं

View Profile