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गाहे-ब-गाहे  जब  चाँद झाँकता है  दरीचे से, तीरगी उसके  इर्द-गिर्द रक्स किया करती है।

                
                                                         
                            ख़यालों की खिड़की तेरी राह तका करती है,
                                                                 
                            
करवटें  बदलते हुए  मेरी रात कटा करती है।

फ़क़त ख़यालों में तेरी आमद के इंतिज़ार में,
उम्मीद की शम'आ चुप-चाप जला करती है।

मेरे दिल का उजड़ा गुलशन आबाद होने की,
खुली हुई खिड़की  दिन-रात  दुआ करती है।

गाहे-ब-गाहे  जब  चाँद झाँकता है  दरीचे से,
तीरगी उसके  इर्द-गिर्द रक्स किया करती है।

अंगड़ाइयाँ लेने लगते मेरे सोए हुए  जज़्बात,
याद-ए-माज़ी की जब बयार चला करती है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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6 मिनट पहले

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