ख़यालों की खिड़की तेरी राह तका करती है,
करवटें बदलते हुए मेरी रात कटा करती है।
फ़क़त ख़यालों में तेरी आमद के इंतिज़ार में,
उम्मीद की शम'आ चुप-चाप जला करती है।
मेरे दिल का उजड़ा गुलशन आबाद होने की,
खुली हुई खिड़की दिन-रात दुआ करती है।
गाहे-ब-गाहे जब चाँद झाँकता है दरीचे से,
तीरगी उसके इर्द-गिर्द रक्स किया करती है।
अंगड़ाइयाँ लेने लगते मेरे सोए हुए जज़्बात,
याद-ए-माज़ी की जब बयार चला करती है।
--- शैलेन्द्र भटनागर "शील "
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