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चैन से सोते हैं अब शहर ए ख़ामोशा में

Şhahnawaz Pahat

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            खलबली सी इक मची है सहरा में
        
                                                    
                            
बू बेवफ़ाई की आती है हवा में
क्यूं ज़ख़्मी ख़ुद को करता है दिले नादां
नहीं शिफा कुछ बेवफाई की दवा में ।

यूं खा जाते हैं धोखे हर बार उनसे
है कोई दिलफरेब ज़ायका ज़ालिम की जुबां में
गलियों से उनकी जरा बचके गुजरना
घुला है ज़हर अब इनकी फ़िज़ा में ।

रोते हैं उम्रभर वो अश्क़ लहू के
होते हैं खुश जो मुहब्बत की इब्तिदा में
कल तलक देते थे नाले वास्ते दिलबर के
चैन से सोते हैं अब शहर ए ख़ामोशा में

वो करते हैं उम्मीद अब बहारों की
कटी है जिंदगी जिनकी खिजां में
वफ़ा की लाश को क्यूँ ढोते हो शाहिद
ना मिलेगा कफ़न भी बेवफ़ा जहाँ में।
-अश्क़ फतेहपुरी
एक घंटा पहले
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