खलबली सी इक मची है सहरा में
बू बेवफ़ाई की आती है हवा में
क्यूं ज़ख़्मी ख़ुद को करता है दिले नादां
नहीं शिफा कुछ बेवफाई की दवा में ।
यूं खा जाते हैं धोखे हर बार उनसे
है कोई दिलफरेब ज़ायका ज़ालिम की जुबां में
गलियों से उनकी जरा बचके गुजरना
घुला है ज़हर अब इनकी फ़िज़ा में ।
रोते हैं उम्रभर वो अश्क़ लहू के
होते हैं खुश जो मुहब्बत की इब्तिदा में
कल तलक देते थे नाले वास्ते दिलबर के
चैन से सोते हैं अब शहर ए ख़ामोशा में
वो करते हैं उम्मीद अब बहारों की
कटी है जिंदगी जिनकी खिजां में
वफ़ा की लाश को क्यूँ ढोते हो शाहिद
ना मिलेगा कफ़न भी बेवफ़ा जहाँ में।
-अश्क़ फतेहपुरी