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चैन से सोते हैं अब शहर ए ख़ामोशा में

                
                                                         
                            खलबली सी इक मची है सहरा में
                                                                 
                            
बू बेवफ़ाई की आती है हवा में
क्यूं ज़ख़्मी ख़ुद को करता है दिले नादां
नहीं शिफा कुछ बेवफाई की दवा में ।

यूं खा जाते हैं धोखे हर बार उनसे
है कोई दिलफरेब ज़ायका ज़ालिम की जुबां में
गलियों से उनकी जरा बचके गुजरना
घुला है ज़हर अब इनकी फ़िज़ा में ।

रोते हैं उम्रभर वो अश्क़ लहू के
होते हैं खुश जो मुहब्बत की इब्तिदा में
कल तलक देते थे नाले वास्ते दिलबर के
चैन से सोते हैं अब शहर ए ख़ामोशा में

वो करते हैं उम्मीद अब बहारों की
कटी है जिंदगी जिनकी खिजां में
वफ़ा की लाश को क्यूँ ढोते हो शाहिद
ना मिलेगा कफ़न भी बेवफ़ा जहाँ में।
-अश्क़ फतेहपुरी
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एक घंटा पहले

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