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स्याही

Shahbaz Khan

Mere Alfaz
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                            मोमिन का दर्द, या ग़ालिब की तन्हाई लिखूँ,
        
                                                    
                            
टॉलस्टॉय का संघर्ष या टैगोर का सम्मान लिखूँ।।

क़ुरआन की आयत, या गीता का सार लिखूँ,
की बदलती रिवायत, या फनाह होती तहज़ीब लिखूँ।।

चांद की चांदनी, या फिर सूरज की आग लिखूं, 
कुछ गुलशन गुलदस्तों पर या सुनसान रास्तों पर लिखूं।।

शाहजहां के ताज पर या बेताज फकीरों पर लिखूं,
रेड-लाइट शहरों पर, या अंधेरे गांव की तस्वीर लिखूं।।

बच्चा चोरी पर, या बाल-मजदूरों पर लिखूं,
खुली किताबों पर, या बंद पड़े स्कूलों पर लिखूं।।

मुम्बई का आतंक, या बाबरी पर हूई सियासत लिखूं,
दादरी का दर्द, या 16 बरस बच्चे का लहू लिखूं।।

बंटी शरहदों पर, या मारे गए सैनिकों पर लिखूं,
जानवरों पर हूई सियासत, या धर्म पर बंटे इंसानों पर लिखूँ।।

मैं लिखूं भी तो स्याही कौन सी लूँ
रंग हरा या भगवा लूँ।।

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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