मैंने कह दी क्या बात आज़माने की
वो सज़ा दे गया मुस्कुराने की
वो जफा करे और याद आए
बात क्या है ये याद आने की
मुझको उसकी पड़ी है सिर्फ उसकी
उसको दस बार फिक्र ज़माने की
गर जो लग जाए आग लग जाए
आग लग जाए मेहरबानी की
उसने चाहत कभी कहा ही नहीं
बात केवल थी तरजुमानी की
उसने दुनिया समझ के छोड़ा है
मैंने राहतें आसमानी की
बस करो भी सितम ये अच्छे हैं
अब क्या खाऊँ क़सम जवानी की
- शहाब उद्दीन'शाह, क़न्नौजी
हाजी गंज,कन्नौज (यू.पी.)
8299642677
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