यूं तो सामाने मुख़्तसर पर हूं
ज़िन्दगी के अभी सफ़र पर हूं
काटना है वही दरख़्त मुझे
शाख़ पर जिसकी मैं शजर पर हूं
नींद ग़ायब है मेरी आंखों से
मैं अगरचे ख़ुद अपने घर पर हूँ
आईने सा नहीं हूंं मैं लेकिन
पत्थरों की सदा नज़र पर हूंं
नग़्मग़ी ये नहीं तो और है क्या
सांस की तुक हूं मैं बहर पर हूं
ज़िन्दगी चल रही है एसे तो
इस सफ़र पर मगर क़सर पर हूं
आदमी बन गया हूं तब से शाह
जब से मैं अपने बालो पर पर हूं
शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी
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