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सफर पर हूं

Shahabuddin Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            
यूं तो सामाने मुख़्तसर पर हूं
ज़िन्दगी के अभी सफ़र पर हूं

काटना है वही दरख़्त मुझे
शाख़ पर जिसकी मैं शजर पर हूं

नींद ग़ायब है मेरी आंखों से
मैं अगरचे ख़ुद अपने घर पर हूँ

आईने सा नहीं हूंं मैं लेकिन
पत्थरों की सदा नज़र पर हूंं

नग़्मग़ी ये नहीं तो और है क्या
सांस की तुक हूं मैं बहर पर हूं

ज़िन्दगी चल रही है एसे तो
इस सफ़र पर मगर क़सर पर हूं

आदमी बन गया हूं तब से शाह
जब से मैं अपने बालो पर पर हूं

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

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4 वर्ष पहले
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