ग़म से रिश्ता मेरा पुराना है
ग़मे दिल साज़ का फसाना है
ये मुहब्बत जो दिल दुखाती है
सोज़ को साज़ सा बनाना है
दर्द इससे बयान होता है
अक्स शीशे सा मुस्कुराना है
आदमी जैसे एक कहानी है
शख्स जैसे के एक फसाना है
सब के सब है जैसे जाना सा
सब का सब ही कभी अजाना है
शाह हरगिज़ नहीं बिसारो तुम
तुम को हर हाल में निभाना है
शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी
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