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ग़ज़ल

Shahabuddin Shahabuddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            ग़म से रिश्ता मेरा पुराना है
        
                                                    
                            
ग़मे दिल साज़ का फसाना है

ये मुहब्बत जो दिल दुखाती है
सोज़ को साज़ सा बनाना है

दर्द इससे बयान होता है
अक्स शीशे सा मुस्कुराना है

आदमी जैसे एक कहानी है
शख्स जैसे के एक फसाना है

सब के सब है जैसे जाना सा
सब का सब ही कभी अजाना है

शाह हरगिज़ नहीं बिसारो तुम
तुम को हर हाल में निभाना है

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी

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8 वर्ष पहले
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