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प्यासा था मैं निकला घर से

Shahab Uddin

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            सियासत के उसूलों पर मोहब्बत हो नहीं सकती
        
                                                    
                            
तू कातिल है तेरी हरगिज अदालत हो नहीं सकती

अमन के वास्ते कोशां रहे तो ही शहादत है
अमन का रहनुमा होना अदावत हो नहीं सकती

बुगज दिल में यकीं करके म सि हाई के दावे कर
जुल्म के रास्ते लेकिन हुकूमत हो नहीं सकती

उकःबी पावं के कारिन्द ना इतरा तू अन्धेरों पर
समझना मत कबूतर से बगांवत हो नही सकती

कोई आई न लेके आ कोई कानून साबित कर
शराफत के मुकाबिल अज हिमाकत हो नहीं सकती

लबादे ओढ ले लफजों के ओहदे पर तू फाईज हो
मगर ये जान ले के मक्र शराफत हो नही सकती

मैं हूं जानिब परसते हकं मुझे मालूम है के सच
से आंखे मूंद लेना भी इबादत हो नहीं सकती
नींद में ही कुछ ख़्वाब आये
हम तुम तुम हम पास आये

प्यासा था मैं निकला घर से
कलसा लेकर फिर आप आये

आंखों की ठण्डक होना था
दर्शन देने स्वंय आप आये

मन का तीरथ ना देखा हमने
सारा जग पैदल हम नाप आये

हरि सुमिरन सुख में जो भाजै
ना उसके घर संताप आये

शाह शहरों में है घोर बनावट
छोड़ के अपने हम गांव आये

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी



Shahabuddin kannauji




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