आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

प्यासा था मैं निकला घर से

                
                                                         
                            सियासत के उसूलों पर मोहब्बत हो नहीं सकती
                                                                 
                            
तू कातिल है तेरी हरगिज अदालत हो नहीं सकती

अमन के वास्ते कोशां रहे तो ही शहादत है
अमन का रहनुमा होना अदावत हो नहीं सकती

बुगज दिल में यकीं करके म सि हाई के दावे कर
जुल्म के रास्ते लेकिन हुकूमत हो नहीं सकती

उकःबी पावं के कारिन्द ना इतरा तू अन्धेरों पर
समझना मत कबूतर से बगांवत हो नही सकती

कोई आई न लेके आ कोई कानून साबित कर
शराफत के मुकाबिल अज हिमाकत हो नहीं सकती

लबादे ओढ ले लफजों के ओहदे पर तू फाईज हो
मगर ये जान ले के मक्र शराफत हो नही सकती

मैं हूं जानिब परसते हकं मुझे मालूम है के सच
से आंखे मूंद लेना भी इबादत हो नहीं सकती
नींद में ही कुछ ख़्वाब आये
हम तुम तुम हम पास आये

प्यासा था मैं निकला घर से
कलसा लेकर फिर आप आये

आंखों की ठण्डक होना था
दर्शन देने स्वंय आप आये

मन का तीरथ ना देखा हमने
सारा जग पैदल हम नाप आये

हरि सुमिरन सुख में जो भाजै
ना उसके घर संताप आये

शाह शहरों में है घोर बनावट
छोड़ के अपने हम गांव आये

शहाब उद्दीन शाह क़न्नौजी



Shahabuddin kannauji




हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें

 
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर