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मशाल जलने दो!

shafaque rauf

Mere Alfaz
                                    
                                                                        
                            मस्तिष्क में जो फूटता है,
        
                                                    
                            
अंकुर उसे तुम फूटने दो,
पीड़ा के अतल सुलगते सागर से,
साहित्य को अब छूटने दो।
बैठे न रहो तुम चौखट पर,
सोचों के बंद किवाड़ों में,
युग को बदलना है तुमको,
पग बाहर घर से रखने दो!

धधकी है जो अंदर तेरे,
वह आग प्रबल होने दो,हाँ,
तुम्हारे अंदर की उस—
चिंगारी को मशाल बनने दो!

माना कि पावस की रिमझिम में,
मोरनी का केवल श्रृंगार यहाँ,
पर तुम तो शेरनी सी निकलो,
करने को सत्य का संधान यहाँ।
रोकना अगर है तो रोको,
अपने अंतस के क्रोध-जाल को,
मस्तिष्क के कचरे-झाड़ों को,
मन के उस भीषण भूचाल को!

जो बेमौसम ही फूट पड़े,
उन नए पत्तों को बढ़ने दो,
नूतन कोंपल की आभा पर—
अब लालिमा का रंग चढ़ने दो!

तुम मत बैठो, तुम मत ठहरो,
पथ पर अविरल तुम बढ़ने दो,
जो जग को रौशन कर डाले,
वह एक मशाल अब जलने दो!

-डॉ शफ़क़ रऊफ
14 घंटे पहले
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